हर लड़की की योनि से जो कि 9 से 13 वर्ष के ऊपर है को हर माह 2 से 7 दिन तक रक्तस्त्राव होने को माहवारी कहतें हैं। किशोरावस्था में कई प्रकार के शारीरिक बदलाव होतें हैं।
अक्सर माहवारी 9 से 13 वर्ष के बीच में शुरू होती है। लड़कियों के प्रजनन अंगों में मुख्य है 1 बच्चेदानी या गर्भाशय, 2 अंडाशय और उनको जोड़ने वाली नलियों यानि फैलोपियन ट्यूब्स। जन्म से ही लड़की के अंडाशयो में बहुत सारे अंडे होतें हैं। जब लड़की बड़ी होती है। तो उसके एक अंडाशय से हर महीने एक अंडा फूटकर बाहर आने लगता है। उसके साथ ही बच्चेदानी यानि गर्भाशय की भीतरी दीवार में खून की परत जमने लगती है।
अगर लड़की के अंडे से पुरूष के बीज यानि शुक्राणु नहीं मिलता है। तो वह अंडा नष्ट हो जाता है। इसी के साथ बच्चेदानी के अंदर खून की परत टूट कर शरीर के बाहर निकलने लगती है। इसे ही माहवारी कहतें हैं।
माहवारी के पहले दिन से लेकर दो सप्ताह बाद, अंडाशय में नया अंडा फूटने के लिए तैयार होने लगता है और गर्भाशय में खून की परत फिर से जमने लगती है।
इस प्रकार यह माहवारी का चक्र चलता रहता है।
यह चक्र कुल 21 से 45 दिनों के मध्य हो सकता है। जब तक स्त्रियां 42 से 52 वर्ष की नहीं होती हैं। तब तक हर महीने उन्हें माहवारी आती है।
यदि इस बीच औरत या किशोरी के अंडे से पुरूष का बीज अर्थात शुक्राणु मिल जाता है। तो गर्भ ठहर जाता है और माहवारी बच्चे के जन्म तक के लिए बन्द हो जाती है।
यह खून की परत बच्चे को विकसित करने के लिए पोषण प्रदान करती है।
माहवारी में सामान्यतः योनि से 35 से 50 मिली लीटर अर्थात् 7 से 10 बड़े चम्मच के जितना खून निकलता है। कभी-कभी यह मात्रा इससे कम या अधिक हो सकती है।
माहवारी के दौरान औरतों या किशोरियों को निम्न परेशानियों का सामना करना पड़ता है-
1- थकान महसूस होना
2-शरीर का ढीला होना
3-चिड़चिड़ापन का होना
4-सिरदर्द का होना
5-स्तनों में कसाव होना
6-काम में मन न लगना
7-कुछ किशोरियों या औरतों में कब्ज की शिकायत भी होती है।
माहवारी जो सामान्यतः 2 से 7 दिनों तक चलती है। उसमें शुरू के कुछ दिनों तक खून का बहाव तेज रहता है। इसके बाद यह कम या समाप्त हो जाता है।
बहुत ज्यादा खून का बहना और थक्कों का निकलना असाधारण और चिंताजनक बात है।
इससे खून की कमी यानि एनीमिया की समस्या हो सकती है।
यदि माहवारी के दौरान असाधारण रूप से बहुत ज्यादा या बहुत कम खून जाये। तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
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